कश्मीर में चुनाव के दौरान भी जारी रहेगा आतंकियों के सफाए का अभियान- J&K ADG मुनीर खान

जम्मू-कश्मीर में निकाय चुनाव नजदीक हैं और इस दौरान सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर नजर आ रही है. आतंकवादियों ने चुनाव में भाग लेने वालों को धमकी दी हुई है जबकि अलगाववादियों ने लोगों को चुनाव में भाग न लेने के लिए कहा है. राज्य के प्रमुख राजनीतिक दल पीडीपी  और नेशनल कांग्रेस चुनाव में भाग नहीं ले रही हैं.

एक्सक्लूसिव बातचीत में जम्मू कश्मीर के एडीजी मुनीर खान ने आकाश हसन से वर्तमान सुरक्षा हालातों पर विस्तार से बातचीत की. पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

आने वाले पंचायत चुनावों के लिए सुरक्षा की तैयारियां किस प्रकार की गई हैं?

बिना किसी संदेह के चुनाव के दौरान सुरक्षा एक चुनौती है. सुरक्षा एक फैक्टर है लेकिन कुछ अन्य मुद्दे भी हैं. चुनौती उन लोगों की संख्या को लेकर है जो चुनाव में भाग लेंगे. कुछ उम्मीदवार संवेदनशील  जगहों से हैं जिनका ध्यान रखना जरूरी है. हम सुरक्षाबलों की तैनाती के लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं. वर्तमान में हम शहरी निकाय चुनावों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं क्योंकि इन चुनावों के बाद पंचायत चुनाव होंगे

शहरी निकाय चुनाव अथवा पंचायत चुनाव ज्यादा मुश्किल कौन हैं

शहरी निकाय चुनाव नगरपालिका की सीमा तक सीमित होते हैं और इसमें उम्मीदवारों की संख्या अधिक नहीं होती. पंचायत चुनाव राज्य के हर नुक्कड़ और कौन तक फैले होते हैं. शहरी निकाय चुनाव की तुलना में पंचायत चुनाव में उम्मीदवारों की संख्या कई गुना अधिक होती है, इसलिए पंचायत चुनाव कराना अधिक मुश्किल है.

क्या चुनाव के दौरान आतंकवादियों के सफाया अभियान पर रोक लगाई जाएगी?

सैन्य अभियान और चुनाव अगल-अलग बाते हैं. आतंकवादियों के सफाए का काम जारी रहेगा.

पुलिस जवानों और उनके परिवार के सदस्यों के अपहरण और हत्या के बाद क्या सुरक्षा बलों के मनोबल में कमी आई है?

जम्मू कश्मीर 1990 से आतंकवाद का सामना कर रहा है. हम हमेशा वक्त की परीक्षा में खरे उतरे हैं. हाल ही में हुई एसपीओ और कॉन्सटेबल की हत्याएं निश्चित तौर पर हमारे लिए एक झटका हैं, लेकिन  हम अधिक जोश और जज्बे के साथ वापसी करेंगे. हम इससे उबर रहे हैं और हम निश्चित रूप से इस झटके उबरकर बाहर निकलेंगे.

आर्टिकल 35और 370 से जुड़े प्रदर्शनों से निपटने के लिए पुुलिस का तरीका अलग है. क्या आपको नहीं लगता है कि पुलिस अन्य प्रदर्शनों से निपटने के लिए भी पुलिस इसी तरीके को अपना सकती है

किसी भी प्रदर्शन को इसकी मैरिट और डिमैरिट को ध्यान में रखकर निपटाया जाता है. जब तक प्रदर्शन शांत है और नियम-कानूनों का उल्लंघन नहीं हो रहा है तब तक हम उनके खिलाफ बल प्रयोग नहीं करेंगे. व्यापारी, वकीलों और नागरिक समाज ने नियमों के दायरे में प्रदर्शन किया. उन पर बल प्रयोग की कोई आवश्यकता नहीं थी. लेकिन जब एक बार प्रदर्शन हिंसक हो गया, पतथरबाजी होन लगी, उन्होंने आगजनी की तो हमें बल प्रयोग के लिए मजबूर होना पड़ा.

जो उम्मीदवार निकाय चुनाव से अपना नाम वापस लेना चाहते थे उन्हों नजरबंद करने की भी खबरे आई हैं. 

इस बात में कोई सच्चाई नहीं है. हमने किसी उम्मीदवार को नजरबंद नहीं किया. हमारा काम उनको सुरक्षा प्रदान करना है, उनको नजरबंद करना नहीं.

क्या आपको लगता है कि राष्ट्रपति शासन के चलते पुलिस की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं

पुलिस के पास हमेशा जिम्मेदारी होती है. अब चाहे वह किसी पार्टी की सरकार हो या फिर राष्ट्रपति शासन, हमें शासन के आदेश के मुताबिक कार्य करना होता है. लेकिन अब पुलिस के पास अतिरिक्त जिम्मेदारी आ गई है. वह हर विभाग के साथ है क्योंकि लोगों के लिए मुश्किल नहीं होनी चाहिए. पुलिस सरकार और लोगों के बीच का पुल है.

शहरी और पंचायत चुनाव में भाग लेने वाले उम्मीदवारों ने दावा किया है कि उनके लिए पर्याप्त सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई है.

एसपीओ को मिलाकर जम्मू कश्मीर पुलिस की संख्या एक लाख है. कुल उम्मीदवारों की संख्या 70 हजार के करीब है. अब अगर हम हर उम्मीदवार की सुरक्षा में दो सुरक्षा कर्मियों को रख लेंगे तो फिर हम क्या करेंगे?

हम कलस्टर के हिसाब से सुरक्षा दे रहे हैं. उम्मीदवारों को सुरक्षित आवास दिए गए हैं. हम अन्य क्षेत्रों को भी सुरक्षित बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं. कुछ स्थानों पर उम्मीदवारों को सुरक्षा विवरण प्रदान किए गए हैं.

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