21 साल पुराने जख्म फिर हुए ताजा, आज ही के दिन दफन हो गई थीं 39 जिंदगियां

1997 में आए इस भूकंप के झटके जबलपुर, मंडला, छिंदवाड़ा और सिवनी में महसूस किए गए थे. धरती के हिलने की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान जबलपुर और मंडला में हुआ था.

 

मध्यप्रदेश के जबलपुर में आए तबाही मचाने वाले भूकंप को 21 साल बीते चुके हैं. 22 मई 1997 को 8.2 तीव्रता से आए भूकंप में कई घर और इमारतें ढह गई थीं, जिसके मलबे में दबकर 39 जिंदगियां जिंदा ही दफन हो गई थी. लेकिन शहर में एक ऐसा बैलेंसिंग रॉक भी है जिसे 8.2 तीव्रता वाला ये भूकंप भी नहीं गिरा पाया था.

यह ऐसा पत्थर है, जिसे देखने में लगता है कि छूते ही गिर जाएगा लेकिन भूकंप भी इसे नहीं गिरा पाया. जबलपुर में बैलेंसिंग रॉक (संतुलित शिला) मुख्य आकर्षण के केंद्रों में से एक है. इसे किसी इंजीनियर या अन्य विशेषज्ञों ने इस तरह नहीं रखा है. सालों से यह पत्थर एक चट्टान पर इसी तरह जमा हुआ है.

कई भूवैज्ञानिक और पुरातत्वविदों के इसके पीछे का रहस्य समझने की कोशिश की. इन वैज्ञानिकों के पास एक ही जवाब है कि पत्थर गुरुत्वाकर्षण बल के कारण अपने स्थान पर जमा हुआ है.

1997 में आया भूकंप भले ही बैलेंसिंग रॉक को न हिला पाया हो लेकिन इस भूकंप ने भारी तबाही मचाई थी.

जबलपुर में 22 मई 1997 को आए भूकंप ने जो तबाही मचाई थी, उससे लोग अभी भी उबर नहीं पाये हैं. इस वजह से जब भी धरती में कंपन महसूस होता है यहां के लोग दहशत से भर जाते हैं.

1997 में आए इस भूकंप के झटके जबलपुर, मंडला, छिंदवाड़ा और सिवनी में महसूस किए गए थे. धरती के हिलने की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान जबलपुर और मंडला में हुआ था. इन जिलों में 8546 घर पूरी तरह से ध्वस्त हो गए थे, जबकि 50 हजार से अधिक इमारतों की नींव को हिला कर रख डाला था.

भू-वैज्ञानिकों द्वारा जबलपुर को भूकंप संवेदी क्षेत्र का दर्जा दिया है. जिस वजह से यहां आने वाला छोटा सा भी भूकंप का झटका लोगों में डर पैदा कर देता है.

आज 21 बरस बीत जाने के बाद भी उन भयावह तस्वीरों को लोग नही भूले है. किसी ने अपने को खोया था तो किसी का आशियाना उजड़ गया था. कोई मलबे मे धंसा रह गया तो कोई आज भी हादसे मे घायल होने के बाद अपंग हो गया था. 1997 मे हुई तबाही से आज भी सैकड़ो परिवार उभर नहीं पाए है.

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